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चेन्नई बाढ़: इंसानियत की अनेक मिसालों के उल्ट नेताओं में गिद्ध बनने की शर्मनाक होड़!

चेन्नई। इरादा किसी को अपमानित करने का नहीं है! लेकिन मानवीय विपदा और प्राकृतिक आपदा के समय चंद मानवों की घृणित करतूत के जो नजारे देखने-सुनने को मिलते हैं, वे दिल दहला देने के लिए पर्याप्त होते हैं. दिमाग सुन्न पड़ जाता है, ज्ञानेंद्रियां जवाब दे जाती हैं. मुझे लातूर-उस्मानाबाद (महाराष्ट्र) में 30 सितंबर, 1993 का वह भीषण भूकंप इसलिए भी याद है कि किल्लारी जैसे दर्ज़नों गांवों के जमीदोज़ मकानों के मलबे में दबी मृत महिलाओं की देहों से किस तरह मानवीय गिद्ध उनके आभूषण नोच रहे थे. सन 2013 में उत्तराखंड में आई भयंकर तबाही के बाद किस तरह कुछ लोग बाकायदा गैंग बनाकर तीर्थयात्रियों से चाकुओं के दम पर पैसे छीन रहे थे. कुछ लोग तो इन्हीं चाकुओं से मृतकों की अंगुलियां काटकर अंगूठियां निकाल रहे थे! चेन्नई और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में आए भयंकर जलप्रलय के बाद कुछ-कुछ वैसी ही मानवीय प्रवृत्ति देखने-सुनने में आ रही है.

चेन्नई बाढ़ 2015

तमिलनाडु की प्राकृतिक आपदा के परम समय किसी केंद्रीय एजेंसी के अभाव के बावजूद अपने छिटपुट प्रयासों से बाढ़ राहत पहुंचाने की कोशिश कर रहे स्वयंसेवकों से राहत-सामग्री लूट लेने की खबरें आईं. यहां तक कि सीएम जयललिता की आल इंडिया अन्नाद्रमुक पार्टी के कार्यकर्ता स्वयंसेवकों को रास्ते में रोककर राहत-सामग्री पर जबरन जयललिता के पोस्टर चिपका रहे हैं. याद रहे कि जब बाढ़ के गंदले पानी में जलमग्न चेन्नई बूंद-बूंद साफ पानी को तरस रही थी तब भी अन्नाद्रमुक के लोग ‘अम्मा’ पानी की बोतलें बांट रहे थे.

यह कैसी मानसिकता है! क्या जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे लोगों के बीच भी नेताओं को पार्टी प्रचार की इतनी जरूरत आन पड़ी? राज्य में चुनाव हो रहा था या नेताओं की जान पर बनी हुई थी? क्या आज की राजनीति इतनी विद्रूप, निर्दयी और क्रूर हो गई है? क्या यह बुनियादी समझ भी घास चरने चली गई है कि प्यासे की प्यास पानी का ब्रांड देखकर नहीं बुझा करती. सोशल मीडिया इन खबरों से पटा पड़ा है कि किस बदतमीजी और दादागीरी से चेन्नई, कांचीपुरम, तिरुवल्लूर और कड्डलूर में जयललिता के राजनीतिक गुंडों ने राहत के ईमानदार प्रयासों को हाईजैक करने की कोशिश की और राहत कार्यों को राजनीतिक फसल काटने का अवसर बनाने का प्रयास किया. शर्म की बात तो यह है कि छतों और पेड़ों पर जान बचाने चढ़ी जनता के बीच कोई नेता नहीं उतरा. चारों तरफ से सिर्फ बयानबाजी ही होती रही. अब जैसे-जैसे जिंदगी लंगड़ाते हुए पटरी पर आने की कोशिश कर रही है, नेता कढ़ी में मिर्च की तरह उतराने लगे हैं.

चेन्नई बाढ़ 2015

इससे बड़ी शर्म की बात क्या होगी कि राहत कार्यों में जुटे सेना के कुछ जवानों से कहा गया कि वे वीआईपी लोगों के रिश्तेदारों को पहले बचाएं, उसके बाद ही आम लोगों की सुध लें! राहत-सामग्री लूटने के लिए जगह-जगह हमले होने की भी खबर है. ऐसी ही एक घटना कड्डलूर जिले के पेरुमल इरी के पास कल्याणकुप्पम गांव में घटी, जहां गांव वालों ने ही एक लॉरी को लूट लिया, जबकि उन्हें पहले ही राहत पहुंचाई जा चुकी थी. जो लोग बाढ़ से प्रभावित नहीं हैं वे मुख्य सड़कों पर इकट्ठे हो जाते हैं और राहत-सामग्री और दवाइयां ले जा रहे वाहनों को निशाना बनाते हैं. कई बार तो यह पुलिस की मौजूदगी में होता है! लूट की कल्याणकुप्पम वाली घटना से तीन दिन पहले, जब स्थिति और भी भयावह थी, तब एआईडीएमके के कार्यकर्ताओं ने पुलिस की मौजूदगी में जयललिता के पोस्टर पैकेटों पर चिपकाए थे. नारीवादी कार्यकर्ता वनती श्रीनिवासन ने स्वयं कई बार सोशल मीडिया पर लिखा है कि किस प्रकार स्थानीय नेता राहत कार्यों का श्रेय लेने की होड़ में अमानवीयता की हद तक गिर गए हैं और एक समूह तो नंगबक्कम के एक घर में घुसकर जबरन दवाइयां और डॉक्टरों को अपने साथ उठा ले गया. एक अन्य जगह बाढ़ प्रभावितों को भोजन बांटने का कार्य तक रुकवा दिया गया.

चेन्नई बाढ़ 2015

यद्यपि एक ओर जहां नेताओं में गिद्ध बनने की होड़ मची है वहीं दूसरी ओर मानवीयता की मिसाल पेश करने वाली खबर भी है. यों तो बाढ़ में करीब 500 लोगों को खो देने और लाखों लोगों के विस्थापन से जूझने वाले तमिलनाडु के लिए देश भर से सरकारी-गैर सरकारी मदद मिलनी शुरू हो गई है, लेकिन पश्चिमी महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले की करीब 2000 यौनकर्मियों ने टुच्ची राजनीति और लाशों पर वोट का खेल खेलने वाले नेताओं को आईना दिखा दिया है. उन्होंने पाई-पाई जोड़कर चेन्नई के राहत कार्यों में अपना योगदान देने के लिए ‘स्नेहालय’ नाम के एक एनजीओ की मार्फत 1 लाख रुपए की धनराशि जिला कलेक्टर अनिल कवड़े को सौंपी है. महत्व राशि का उतना नहीं है जितना कि उनके जज्बे का है. इस एनजीओ के संस्थापक गिरीश कुलकर्णी का कहना है कि यह धनराशि जुटाने के लिए ये यौनकर्मी एक जून का खाना तक छोड़ चुकी थीं.

बाढ़ ने तमिलनाडु; खास कर चेन्नई को पंगु बना दिया है. राजधानी की कुल 87 लाख की आबादी में से 50 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ी हैं. ऐसे में खुद को जनता का कर्णधार समझने वालों को अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है. लोगों के दिलोदिमाग पर लगे जख्मों पर मरहमपट्टी की जरूरत है. पोस्टर और बैनरों की लड़ाई करके घटिया राजनीति करने का न तो यह मौका है न दस्तूर!

News Source :- abpnews.abplive.in

Published: Thursday, Dec 10, 2015 - 09:20 (IST) | Updated: Thursday, Dec 10, 2015 - 09:22 (IST)

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