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ये थी दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी जिसकी लाइब्रेरी 6 महीने तक जलती रही

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नालंदा विश्वविद्यालय 6th Century B.C. में पूरे विश्व में शिक्षा का केंद्र हुआ करती थी। कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत और तुर्की से यहां स्टूडेंट्स और टीचर्स पढ़ने-पढ़ाने आते थे, लेकिन बख्तियार खिलजी नाम के एक सिरफिरे शासक की सनक ने इसको तहस-नहस कर दिया। उसने नालंदा यूनिवर्सिटी में आग लगवा दी, जिससे इसकी लाइब्रेरी में रखीं बेशकीमती किताबें जलकर राख हो गईं। खिलजी ने नालंदा के कई हिन्दू धर्मगुरुओं और बौद्ध भिक्षुओं की भी हत्या करवा दी। कहा जाता है नालंदा विश्वविद्यालय में रखी किताबों की संख्या इतनी अधिक थी कि 6 महीने तक आग बुझ नहीं पाई थी

कौन था बख्तियार खिलजी और क्यों करवाया उसने ऐसा. अगली स्लाइड्स में जानिए इतिहास के उन काले पन्नों को

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खिलजी का पूरा नाम इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी था। खिलजी ने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। इतिहासकार विश्व प्रसिद्ध नालंदा यूनिवर्सिटी को जलाने के पीछे जो वजह बताते हैं उसके अनुसार एक समय बख्तियार खिलजी बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया। उसका काफी इलाज किया गया पर कोई फायदा नहीं हुआ। तब उसे नालंदा यूनिवर्सिटी के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल शीलभद्र से उपचार कराने की सलाह दी गई। उसने आचार्य राहुल को बुलवा लिया तथा इलाज से पहले शर्त लगा दी की वह किसी हिंदुस्तानी दवाई का सेवन नहीं करेगा। उसने कहा कि अगर वह ठीक नहीं हुआ तो आचार्य की हत्या करवा देगा।

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अगले दिन आचार्य उसके पास कुरान लेकर गए और कहा कि कुरान के पेज नंबर इतने से इतने तक रोज पढ़िए ठीक हो जाएंगे। उसने ऐसा ही किया और ठीक हो गया। खिलजी को अपने ठीक होने की खुशी नहीं हुई इसके विपरीत उसे बहुत गुस्सा आया कि उसके हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है। हिन्दू धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले उसने 1199 में नालंदा यूनिवर्सिटी में ही आग लगवा दी। वहां इतनी पुस्तकें थीं कि तीन महीने तक यहां से धुआं उठता रहा। उसने हजारों धर्माचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करा दी। खिलजी के ठीक होने की जो वजह बताई जाती है वह यह है कि वैद्यराज राहुल शीलभद्र ने कुरान के कुछ पेज के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था। वह थूक के साथ मात्र दस बीस पृष्ठ चाट गया। ठीक हो गया और फिर भी उसने इस एहसान का बदला नालंदा को नेस्तनाबूद करके दिया।

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नालंदा उस समय भारत में उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण और विश्व विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्धधर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजी गई इस बौद्ध यूनिवर्सिटी के अवशेष इसके प्राचीन वैभव का अंदाज करा देते हैं। सातवीं सदी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस यूनिवर्सिटी के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी में यहां जीवन का एक साल एक स्टूडेंट और एक टीचर के रूप में व्यतीत किया था। प्रसिद्ध ‘बौद्ध सारिपुत्र’ का जन्म भी यहीं पर हुआ था।

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नालंदा यूनिवर्सिटी की स्थापना गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त प्रथम ने 450-470 ई. के बीच की थी। यूनिवर्सिटी स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना थी। इसका पूरा कैम्पस एक बड़ी दीवार से घिरा हुआ था जिसमें आने-जाने के लिए एक मुख्य दरवाजा था। नॉर्थ से साउथ की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में भगवान बुद्ध की मूर्तियां थीं। यूनिवर्सिटी की सेंट्रल बिल्डिंग में 7 बड़े और 300 छोटे कमरे थे, जिनमें लेक्चर हुआ करते थे। मठ एक से अधिक मंजिल के थे। हर मठ के आंगन में एक कुआं बना था। 8 बड़ी बिल्डिंग्स, 10 मंदिर, कई प्रेयर और स्टडी रूम के अलावा इस कैम्पस में सुंदर बगीचे और झीलें भी थीं। नालंदा को हिंदुस्तानी राजाओं के साथ ही विदेशों से भी आर्थिक मदद मिलती थी। यूनिवर्सिटी का पूरा प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जिन्हें बौद्ध भिक्षु चुनते थे।

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इस यूनिवर्सिटी को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान दिया। इसे सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला नालंदा को स्थानीय शासकों और भारत की दूसरी रियासतों के साथ ही कई विदेशी शासकों से भी अनुदान मिलता था। यह विश्व की पहली पूर्णतः आवासीय यूनिवर्सिटी थी। उस समय इसमें स्टूडेंट्स की संख्या करीब 10,000 और टीचर्स की संख्या 2000 थी। यहां भारत से ही नहीं कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी स्टूडेंट पढ़ने आते थे।

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नालंदा के स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं से बारहवीं सदी तक अंतर्राराष्ट्रीय ख्याति रही थी। विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की मूर्तियां स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें व्याख्यान हुआ करते थे।

यहां हुई खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने की संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे। प्रत्येक मठ के आंगन में एक कुआं बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी।

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विश्वविद्यालय का प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे। कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य देखती थी और द्वितीय समिति सारे विश्वविद्यालय की आर्थिक व्यवस्था तथा प्रशासन की देखभाल करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले दो सौ गांवों से प्राप्त उपज और आय की देखरेख यही समिति करती थी। विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे। नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और स्थिरमति प्रमुख थे।

ह्वेनसांग के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख शीलभद्र थे। प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट्ट भी इस विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। यहां प्रवेश लेने के लिए कठिन परीक्षा होती थी। उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों को पास करना होता था। आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान देकर शिक्षा देते थे।

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नालंदा कि खुदाई में मिली अनेक कांसे की मूर्तियोँ के आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि धातु की मूर्तियां बनाने के विज्ञान का भी अध्ययन होता था। यहां खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। नालंदा में हजारो विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक बहुत बड़ा पुस्तकालय था जिसमें तीन लाख से अधिक पुस्तकें थीं। इस पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें थी।

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